Wednesday, January 17, 2018

परिवर्तन


ऐसा मेरे साथ दो बार हुआ | पहली बार मेरा निर्णय कुछ और था और दूसरी बार बिलकुल अलग |  एक किताब पढ़ रही थी उसी दौरान , लगा जैसे उन पन्नो में लिखें शब्दों की वजह से ही मेरे दूसरे बार के निर्णय में बदलाव आया | बात दिसंबर की है, मैं भारत के बाहर थी, किसी काम के सिलसिले में मेक्सिको में | हुआ यूँ की नौ दिन के लिए कमरा खाली था , और खुली रह गयी थी कमरे की खिड़की | फिर क्या था , सोसाइटी के कबूतरों को मानो जैसे कोई घर मिल गया हो, या कहो कोई नयी ज़मीन जहां आशियाना बना लिया जाए | वापिस आयी तो देखा की “स्टडी टेबल” पर अच्छा ख़ासा लकड़ियों का घोंसला बना हुआ है |  हैरानगी थी, पर आत्मीयता नहीं थी, अचम्भा था पर सहानुभूति नहीं थी , गुस्सा तो नहीं था, पर लगा था कि ये कबूतर कितनी सही चीज़ सिखा गए अनजाने में : मेरे जाने के बाद जो यह सब कृत्रम रूप से मेरा लगता है, किसी और का ही तो होगा |  पर कहानी ये नहीं है , कहानी कुछ और है |

जब मैंने पहली बार उस घोंसले को देखा जो कि इतनी बारीकी से बनाया गया था , मुझे बिलकुल भी अनुभूति नहीं थी की कितनी  मेहनत से उस कबूतर ने एक-एक लकड़ी बीन कर , अपनी चोंच में दबाकर ये घोंसला बनाया होगा | किसी कलाकारी से कम नहीं था वो घोंसला | मुझे विश्वास ही नहीं हुआ था की ये कला भी कितनी उन्नत है उनमे | अपने कमरे की सफाई मैं ही करती हूँ, तो फिर क्या था  मेक्सिको से आने के दिन ही मैंने सफाई शुरू कर दी, और बिना कुछ सोचे समझे झाड़ू के एक झटके से उस घोंसले को बिखरी हुई लकड़ियों में तब्दील कर दिया | आज लगता है की बिगाड़ने में मुझे वक़्त ही नहीं लगा, उस कबूतर को कितना वक़्त लगा होगा टहनियों को बटोरने में | कमरा साफ़ हो गया और ज़िन्दगी आगे बढ़ गयी | लेकिन मैंने निर्णय लिया की कमरे से बाहर निकलते वक़्त खिड़की बंद करनी चाहिए |
First time
कुछ वक़्त तक ध्यान रहा अपितु एक दिन फिर भूल गयी दफ्तर जाते वक़्त |  शाम को वापिस आयी तो अचंभित थी, मात्र नौ घंटो में एक घोंसला भी था और उसके बीच में था एक नन्हा सा सफ़ेद अंडा , कबूतर का अंश | उसे तो मैं देखती ही रह गयी , सोचा , “भाई , इतनी सारी जगहों से आपको यही जगह मिली”, उसे लगा होगा मैडम फिर चली गयीं नौ दिन के लिए और अब मज़े उसके हैं | पर इस बार शिशु भी था , घोंसले को जिम्मेदारी से संभालना था | न घोंसले को बिखेर सकते थे न ही अंश को ध्वस्त कर सकते थे | सोच में पड़ गयी | फिर सूझ भूझ से, दो-तीन पन्नो का सख्त आधार बनाया और उसे घोंसले के नीचे सरकाया और इसी तरह घोंसले और उस अंश को बरामदे में रख दिया | पर कबूतर को बार-बार लग रहा था की उसका घोंसला और बच्चा अंदर कैद हो गया है , वह बार - बार खिड़की से आने की कोशिश करता , मुझे देख के उड़ जाता | मैंने समझाने की कोशिश की, कहा, “भाई, उस तरफ आपका घोंसला और बच्चा दोनों सलामत हैं |  आप वहां देख सकते हैं” |  शायद उसने सुन लिया , दोबारा नहीं आया |
Second time
पर मैं सोच में थी , मैंने पहली बार बिना सोचे समझे ही  घोंसले का सर्वनाश कर दिया था , लेकिन इस बार ऐसा नहीं किया था | क्यों? उस अंश के कारण? शायद हाँ | पर घर तो घर था , मेहनत से बनाया गया था | उन लकड़ियों को कूड़े दान में न डालकर बरामदे में रखा जा सकता था , कबूतर की चुनिंदा मेहनत थी आखिर |  ऐसा पहले नहीं सोचा था |  श्रेणी का उच्च जानवर होने के कारण मेरी जिम्मेदारी थी की निम्न वर्गों की रक्षा करूँ लेकिन मैंने तो आक्षेप किया था | कुछ कुछ समझ आ रहा था , और यह भी समझ आ रहा था कि दूसरी बार मेरे ही कमरे में घोंसला बनना एक संयोग नहीं था |  एक सोची हुई घटना थी | पता नहीं माफ़ी मिलेगी या नहीं , लेकिन सीख ज़रूर मिल गयी थी | थोड़ा सा हृदय परिवर्तन शायद हो गया था | शायद पहली बार समझ आया था की उस कबूतर और मुझ में कोई अंतर न था |

Tuesday, January 2, 2018

माँ

This morning I called up my mother while shivering in the early morning cold weather of Dehra Dun. The conversation was a very normal one but to my cold heart it was nothing less than an anodyne and throughout the day I kept thinking about her and wrote these words....


माँ
माँ वो है जो दूर से मेरे काँपते हाथों को महसूस करे,
और उसकी रूह में कंपकपी छूट जाए ।

माँ वो है जिसकी सिर्फ आवाज़ ही,
इस कड़कती सर्दी में सूरज की धूप को मात दे जाए।

माँ वो है जिसके स्नेह की गरमाहट, जनवरी की इस तोड़ने वाली सर्दी को मेरे सीने से निकाल,
उसमें गहरी धूप भर जाए।

माँ वो है जो मेरी चिन्ताओं को मेरे भूल जाने के बाद भी, 
उनके बारे में सोचते रहे ।

माँ वो है जो चाहे की मैँ मज़बूत बनूँ ,
पर गर मेरी आँखों में आंसू आ जाए,
तो उसका आँचल मुझे और सशक्त कर दे ।

माँ वो है  जिसे मैँ सात जन्मों में भी समझ न पाऊँ,
और सौ जन्मों के बाद भी उसके काबिल न बन पाऊं।

माँ वो है जिसका दुख दर्द बच्चे भले ही भुला दें,
पर जिसका सुकून फिर भी उसके बच्चों की खुशी में है ।

माँ वो है जो हर रात अपने बच्चों को याद कर सोती है,
बच्चे भले ही ज़िन्दगी की अंधी दौड़ में उसे भुला जाएं ।

माँ वो है जो न कुछ मांगती है, न कुछ चाहती है, न जताती है, न सताती है,
माँ वो है जो रात भर खुद न सोकर,
अपने बच्चों को हवा देकर सुलाती है |
खुद भूखी रह जाती है,
पर अपने बच्चों की भूख मिटाती है ।

माँ वो है जिसके गुणगाण में शब्द अधूरे हैं। 

माँ वो है ...... जैसे उसके तो खुदा भी नहीं |

माँ वो है जिसकी संतान होने के काबिल हर कोई तो नहीं,
और मैं तो हरगिज़ नहीं । 

My trip to Swasthya Swaraj : Computer Lessons

This is a post in continuation of my attempt to share lessons from my visit to Swasthya Swaraj Society. Swasthya Swaraj is a secular, not-...