Sunday, May 8, 2016

शुक्रिया

जब गुम हो जाते हो मुझसे यूँ कहीं दूर तुम,
आँखों में ये मेरी नमी तो होती नही है,
पर जिगर में मेरे तेरे लिए दुआयं होतीं हैं,
एक शुक्रिया और एक एहसास होता है.

ख़ुसनसीब हूँ मैं जो तुमने मुझे
यह हक़ दिया की तुझे यूँ कुछ दे सकूँ,
खुदा इतनी मोहब्बत करता है मुझसे,
मालूम नही था मुझे,
तुझसे मिलकर ऐसा लगा की उसके
स्नेह की कोई सीमा ही नही मेरे लिए....

जो दूर हुए हैं हम अभी,
सोच रहा हूँ, कैसे तुम समा गयी हो,
रूह में मेरी,
कैसे बस गयी हो साँसों में मेरी,
विश्वास नही होता मुझे,
कोई इतना दीवाना कर गया मुझे....

आक्रोश होता है मुझे यह सोचकर,
कैसे जीऊँगा तेरे बिना,
लेकिन फिलहाल तो इन अश्कों की बारिश मैं,
इबादत कर रहो हूँ तेरी..

शुक्रिया ए हसीन, शुक्रिया मेरे दोस्त,
शुक्रिया इस ज़मीन को ज़िंदा करने के लिए,
शुक्रिया मुझे अपनाने के लिए,
शुक्रिया मुझे ज़िंदा रखने क लिए.

गर अलग भी होना पड़ा तुझसे कभी,
तो यह सोच के जी लूँगा,
कोई था जो यूँ मुझे चन्द पलों में,
मोहब्बत सिखा गया,
खुशियाँ जीवन भर की दे गया.

My trip to Swasthya Swaraj : Computer Lessons

This is a post in continuation of my attempt to share lessons from my visit to Swasthya Swaraj Society. Swasthya Swaraj is a secular, not-...